संवेदनहीनता – तनिक विचार करें*

*संवेदनहीनता – तनिक विचार करें*
आज  हम  सबसे  ज्यादा  जुड़े  हुए  हैं  और  सबसे  ज्यादा कटे  हुए  भी ।  फोन  में  हजारों  कॉन्टैक्ट्स  हैं , सोशल मीडिया  पर  सैकड़ों  फॉलोअर्स  हैं,  पर  पड़ोस  में  रोते  हुए  बच्चे  की  आवाज  हमें  सुनाई  नहीं  देती ।
यही  है  संवेदनहीनता  –  दूसरों  के  दुख,  दर्द  और  जरूरत  के  प्रति  मन  का  सुन्न  हो  जाना ।
पहले  लगता  था  कि  बुरे  लोग  ही  संवेदनहीन  होते  हैं । अब  समझ  आता  है  कि  संवेदनहीनता  कोई  गाली  नहीं, एक  आदत  है  जो  धीरे- धीरे  हम  सब  में  घर  कर  रही है ।
*संवेदनहीनता  दिखती  कैसे  है ?*
सड़क  पर  एक्सीडेंट  हुआ  है ।  20  लोग  वीडियो  बना रहे  हैं,  एक  भी  एम्बुलेंस  को  फोन  नहीं  कर  रहा ।  यही संवेदनहीनता  है ।
घर  में  माँ  पूरे  दिन  काम  करके  थक  गई  है,  पर  हम पूछते  तक  नहीं  कि  पानी  चाहिए  क्या ?  ऑफिस  में साथी  डिप्रेशन  में  है,  पर  हम  कह  देते  हैं –  “नाटक  कर रहा  है ।”  किसी  की  मौत  की  खबर  पर  भी  हम  मीम बना  देते  हैं ।
हम  सुनते  सब  हैं,  पर  महसूस  कोई  नहीं  करता ।
*ये  आई  कहाँ  से ?*
*1. अति  सूचना: * रोज  सैकड़ों  बुरी  खबरें  देखते -देखते हमारा  दिमाग  खुद  को  बचाने  के  लिए  सुन्न  हो  गया  है । आज  बाढ़,  कल  युद्ध,  परसों  रेप ।  दिमाग  कहता  है, अगर  हर  चीज  पर  रोओगे  तो  जी  नहीं  पाओगे ।
*2.  ‘मैं  ही  ठीक  हूँ’  की  सोच :*  हमने  सफलता  को इतना  निजी  बना  दिया  है  कि  दूसरा  इंसान  हमें प्रतिस्पर्धा  लगता  है,  इंसान  नहीं ।
*3. सुविधा  का  नशा: *  AC  कमरे  में  बैठकर  गरीबी पर  भाषण  देना  आसान  है ।  जब  तक  तकलीफ  हमारे घर  नहीं  आती,  हमें  वो  तकलीफ  लगती  ही  नहीं।
*क्या  हम  सच  में  बुरे  लोग  हैं ? *
नहीं।  हम  बुरे  नहीं  हैं,  हम  थके  हुए  लोग  हैं । संवेदनहीनता  अक्सर  संवेदनशील  लोगों  को  ही  होती  है,  जो  ज्यादा  महसूस  करके  थक  गए  हों ।
पर  इसे  पहचानना  होगा ।  क्योंकि  जो  समाज  दूसरों  का  दर्द  महसूस  करना  बंद  कर  दे,  वो  विकास  नहीं करता,  सिर्फ  भीड़  बन  जाता  है ।
*तो  करें  क्या ? *
बड़ा  कुछ  करने  की  जरूरत  नहीं  है ।
*1. सुनना  शुरू  करें,  जवाब  देने  के  लिए  नहीं,  समझने के  लिए ।*
*2. स्क्रीन  से पहले  इंसान  देखें ।*  मदद  का  मौका  मिले  तो  मोबाइल  नीचे  रखकर  पहले  हाथ  बढ़ाएं ।
*3.  अपने  घर  से  शुरू  करें ।*  संवेदनशीलता  NGO  में नहीं,  किचन  में  परखी  जाती  है ।
अंत  में  एक  बात  याद  रखिए  –  हमारा  ज्ञान,  पैसा,  डिग्री  सब  यहीं  रह  जाएगा।  लोग  हमें  इस  बात  से  याद  रखेंगे  कि  हमारे  होने  से  उन्हें  कैसा  महसूस  हुआ था ।
कभी -कभी  रुककर  तनिक  विचार  करें  – क्या  हम  जिंदा  हैं  या  सिर्फ  जी  रहे  हैं ?
क्योंकि  धड़कता  हुआ  दिल  ही  इंसान  की  पहचान  है, चलता  हुआ  शरीर  तो  मशीन  भी  है ।
यह  भी  पढ़ें – * कर्म  ही  सफलता  का  मार्ग
  *  असली  खुशी  भौतिक  चीजों  में  नहीं

Similar Posts

Leave a Reply